सच..

“लगता है अब मै अपने ख्वाब सच नही कर पाऊँगा वो मेरे मन से दिल तक की लम्बी दूरी के बीच ही रह जाएँगे, क्या ख्वाब हकींकत में नही बदलते या हकींकत का कुछ अपना ही ख्वाब है …. ये हवाए कहाँ तक ले जाएँगी मुझे , क्या मै उनके साथ चल सकुँगा…क्या मेरा भी…..” […]

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जब वो मिली…

मेरे वहाँ पहुचने से पहले ही वो चली गयी थी तो मै वहीं बगल की सीट पर आसीन हो गया… और अखबार पढ़ते हुए उसका इंतजार करने लगा काफी देर हो रही थी और वो अभी आयी भी नही थी… तो मै वहीं उसी रास्ते पर आगे चल पड़ा | सड़क के दाँयी तरफ से […]

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मुस्कान…

वो हँसती नही मुस्कराती है, उसे होंठ खोलकर हँसना नही भाता उन्हे दबाकर मुस्काना आता है, दबे होंठ और छुपे दाँत एक लम्बी सी लकींर, झुकी नज़र, बालो का एक गुच्छा, माथे पर… कल्पना है वो मेरी श्रष्टि से कह दो रूक जाए, शब्द वापस आ जाए अपने अर्थो में, पक्षिये से कह दो रूक […]

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क्या?

“ठीक हैं….लेकिन अगर मै एक बार देख लेती तो पापा…” मैने मम्मी के पीछे से छुपते हुए पूछा… मै भी उन्ही लड़कियो में से थी जो इस तरह की शादियाँ करने में हिचकिचाती है | पापा बिना कुछ बोले ही चले गये… शायद अब वो मुझे समझाना नही चाहते थे या उन्हे पूरा विश्वास रहा […]

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बतकहीं

शहर से राजधानी तक वो बोलती गयीं और मै सुनता गया, वैसे तो पहली बार मिला था उनसे.. “कहाँ जा रहे हो..?”. पूछा था उन्होने.. “वो कल पेपर है..तो….” मैने बताया “अच्छा….अकेले?” पूछा उन्होने “नही, दो दोस्त और है” …. काफी देर बातचीत के बाद प्रश्न गंभीर होने लगे, वो पूछती मै बताता…और फिर वो […]

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तुमको क्या लगता है?

क्या आसान है ये जिन्दगी.. या झूठ है ये जिन्दगी.. या किसी का ख्वाब है ये जिन्दगी.. या साये का दर्द है ये जिन्दगी.. या महान सपनो से है जिन्दगी.. या मेरे साँस लेने से है ये जिन्दगी.. . . पर क्यो है ये जिन्दगी.. क्या मै अधूरा हूँ तुम्हारे बिना.. तुमको क्या लगता है, […]

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लेकिन….(३)

लेकिन… आकार ने फोन लाउडस्पीकर पर रखा तो आवाज आयी उधर से “हलो” किसी ने बड़ी निर्भीकता से कहा..पर कौन हो सकता है.. “आ..आ…आकृति” हकलाते हुए आकार ने कहा.. “हाँ, कौन?” आकृति ने पूछा.. “मै…मै…..आ…आकार..” आकार ने कहा “बड़ी जल्दी ….” तो इस तरह शुरूआत की थी आकार ने… . . . समय के साथ […]

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